Tuesday, 5 June 2012

दिल्ली वालों से गुज़ारिश है मेरी ................

दिल्ली वालों से गुज़ारिश है मेरी ,
कि मेरे दिल का भी ख्याल करें
जो ज़माने से कह रहे थे कि मेरे है वो
वो अपनी बात पर खुद तो ज़रा एतबार करें |
सारी दुनिया से हमें काट कर किया अपना
मेरी आँखों में बसाया था स्वयं का सपना ,
कभी वो टूट कर मेरा भी इंतज़ार करें |
वो अपनी बात पर खुद तो ज़रा ऐतबार करें |
वो नहीं चाहते हम कोई दखल दे ऐ दोस्त ,
उनकी हर बात अपनी आँख बंद कर माने ,
वो अगर मुझसे कहें सांस न ले तो फिर हम ,
खुद को भी खत्म करें और हर कहा माने ,
कोई समझाए अब उन्हें कि वो प्यार को यूँ न शर्मसार करें ,
वो अपनी बात पर खुद तो ज़रा एतबार करें |
दिल्ली वालों से गुज़ारिश है मेरी ................

मेरा गहना

अब बहुत हुआ है धोखों पर धोखे खा कर जिंदा रहना ,
इससे तो अच्छा है मिटना  अच्छा है अब कुछ न कहना  |
वो बार बार ये कहता था कि मेरे बिन वो कुछ भी नहीं ,
अब छोड़ गया है वो मुझको मुश्किल है अब ये गम सहना |
मैं रुकी हुयी एक नदिया थी सागर से मिलने को व्याकुल ,
पर कैसे संभव है रुक कर मिलाना है तो फिर है बहना |
बिंदिया काजल चूडी पायल इन सबका मुझको काम नहीं ,
बस एक तुम्हारा प्रेम प्रिये कहलाता है मेरा गहना |

सती को गरल वरदान में ।

फिर मुझे उलाहने दे कर 
उसने कोशिश की है 
मुझे खुद से अलग करने की ।
पर उसे मालूम नहीं की 
उसे मुझसे भिन्न करने का साहस 
अब स्वयं शिव में नहीं ,
वो भी घबराता है 
देख मेरा प्रेम उसके प्रति ।
शिव भी अचरज में हैं ,
कैसे अलग करें उसे जो सती 
जैसा प्रेम लेकर 
अवतरित हुयी है धरती पर ,
उसे अपना शिव मान 
जी रही है जीवन ।
उलाहना का गरल अब 
उसकी किस्मत का हिस्सा है ,
शिव ने जो विष अपने गरल में  धारण किया ,
नहीं उतरने दिया शरीर के बाकि हिस्सों में ,
नहीं थी सामर्थ्य शिव में 
इसीलिए दे कर उलाहना 
दे दिया शिव ने 
सती को गरल वरदान में ।

Monday, 4 June 2012


जीवन के उस पार

फिर वही दुखांत 
क्या कभी सुख कि परिणति होगी 
क्या कभी मेरे जीवन के इस कीचड़ में भी 
कमल जन्म लेगा ;
क्या कभी कोई राम 
मुझे भी अहिल्या कि तरह उद्धारेगा ,
बस इसी सोच में चला जा रहा था जीवन ,
हर ने आ कर भावनाओं के  पत्थर फ़ेंक
मन में हलचल मचा दी ,
परन्तु ह्रदय सत्य कि समाधी पर था ,
भेद कर लिया उसने 
क्या सुख देंगी तुझे यह छडिक जीवन में बंधी 
जीवन से लड़ती
अपने सुख के लिए मरती कयाये |
तुझे तो सुख शिव कि शरण में लिखा है ,
जपते हुए 
"सत्यम शिवम सुन्दरम"
और  
"ओम् नमः शिवाय "
का जाप 
तुझे जाना होगा अब इसी छण
जीवन के उस पार |

नहीं मालूम कि तुम सत्य थे

नहीं मालूम कि तुम सत्य थे 
या 
फिर किसी असत्य ने दस्तक दी थी 
मन पर मेरे ,
तुम्हारी आँखों को पढने कि चाह में ,
बार बार आती रही पास तुम्हारे ,
पर कभी मिला ही नहीं सकी नज़रें तुमसे 
कभी शर्म के वशीभूत हों ,
कभी  प्रेम के ,
और
कभी  भय के कि कहीं पढ़ न लूं मैं 
तुम्हारी आँखों में वो जो तुम्हारे कर्म कहते हैं |
तुम प्यार के दावे करते रहे और मैं उन्ही को सत्य मान 
जीती रही ,
खुश होती रही ,
और 
एक दिन तुम्हारी डायरी के पन्नों पर 
तुम्हारी ही लेखनी से
कई बार लिखा देखा किसी और का नाम |
फिर भी मन को संजोया 
और अपने विश्वास को भी ,
इस जोड़ तोड़ में कि पूछूं या नहीं 
मैं जाने कब कह गयी तुमसे ह्रदय कि बात ,
पर स्पस्टीकरण न देकर 
तुमने मुझे ही आरोप प्रत्यारोप के 
भंवर में फंसा दिया ,
मुझे ही गलत कह 
मेरे प्रेम का अनादर कर चले गए तुम 
शायद न वापस आने के लिए,
इतने प्रयत्न किये थे तुमने ,
मुझे छोड़  कर जाने के लिए |



मेरा इंतज़ार |

कितना द्वन्द है मन में 
कि कहूँ या न कहूँ ,
वो  पुरानी बातें जिन्होंने मुझे 
खत्म कर दिया जीते जी ,
सांस तो लेती हूँ
ह्रदय में स्पंदन भी महसूस करती हूँ ,
फिर भी प्राण नहीं ,
हर पल बस तुम्हारा स्पर्श याद आता है ,
जिसने जीवन को एक नया आयाम दिया था 
मैं खुद से कब तुम्हारी मीठी , पगली ,
और न जाने क्या क्या बन गयी थी ,
मेरे लिए अपना घर छोड़ 
तुम मेरे समीप हमारे नीड़ का 
निर्माण कर रहे थे ,
जहाँ हमने वो पल गुज़ारा 
जिसने हम दोनों का अंतर खत्म कर दिया ,
दो से एक होने के इस सफर में ,
मैं बस तुम्हारी तुम्हारी होती गयी ,
और तुम हर बार मुझसे दूर और दूर ,
मुझे तुम्हारी कमियां भी अच्छी लगाने लगी ,
और तुम्हे मेरे अंदर कि सारी अच्छाइयां ,
जिनका आभास तुमने मुझे कराया था ,
झूठी लगाने लगी |
अभी भी मन के अंदर 
विश्वास लिए बैठी हूँ 
तुम लौट कर आओगे ,
एक रोज ,
फिर मुझसे कहोगे 
कि मैं ही प्राण हूँ तुम्हारा ,
जीवन का आधार हूँ तुम्हारा ,
पता है कि बहुत छोटा होगा ये इंतज़ार ,
दुनिया में प्यार नहीं 
वही है जो तुमने मेरी झोली में डाला है ,
बस फर्क इतना है आज ये मेरे हिस्से में है ,
कल तेरे हिस्से में होगा ,
इंतज़ार 
मेरा इंतज़ार |