Monday, 4 June 2012

तुम कहना भी चाहते थे

तुम्हारे साथ 
थी जब मैं आज 
क्यूँ धूप में तपती हवा भी ,
हों गयी थी शीतल बयार |
क्यूँ भूख का एहसास जागा था ,
क्यूँ पानी में भी लगी थी 
गंगाजल जैसी मिठास ,
क्यूँ लगा था कि तेरे 
सीने से लगकर रो लूं ,
और अपने किये सारे पाप धो लूं |
क्यूँ ईश्वर दिखा था मुझे तुमने ,
जब तुम्हारे पास होने के एहसास से 
मैं खुश भी थी  और सहमी भी ,
क्यूँ लग रहा था कि 
कहीं खो न दूं ,
वो सुख जो जीवन में पहली बार  मिला है ,
प्रेम पाने का सुख ,
बांटा तो बहुत था प्रेम ,
बहुत लोग थे जो थे मेरे लिए अपने ,
पर क्या मैं किसी का अपनी  थी  ,
अभी तक तो किसी ने इतना स्नेह 
नहीं दिखाया था ,
किसी ने नहीं कहा था 
कि मैं उसका जीवन हूँ ,
क्यूँ तुम्हारी ख़ामोशी में ढूँढा था मैंने 
वो सब कुछ जो मैं सुनना चाहती 
और शायद तुम कहना भी चाहते थे |

Sunday, 3 June 2012

वो हमसे झूठ कहता था कि वो सोता बहुत कम है ,
हमें जब भी मिला तो आँख उसकी बंद रहती थी ,
बहुत झंझ्कोरते थे हम कि शायद उठ के वो सुन ले ,
मगर  मिलने कि चाहत अब कहाँ उस दिल में रहती थी |
ना वादों पर भरोसा है ना बातों पर यकीं तेरी,
कभी पूरी न कि तूने मुरादें एक भी मेरी |
अगर तूने मुझे उस तरह अपनाया नहीं होता ,
तो तुझसे इस कदर जुडती नहीं नजदीकियां मेरी |
मैं तेरे सामने हंस कर बता देती हूँ मैं खुश हूँ ,
मगर दिलकी नमी को जानती तन्हाइयां मेरी |
मैं तुझसे जुड गयी हूँ इस कदर ऐ हमसफ़र मेरे ,
कि मुझको दिख नहीं पाती हैं अब रुसवाइयाँ मेरी |
अगर तू साथ देने का करे वादा तो फिर हम भी ,
चलेंगे  साथ तेरे उम्र भर परछाई बन तेरी |

मात खा गया

एक टूटा हुआ ख्वाब मेरे हिस्से आ गया ,
वो टूट के बिखरा तो मेरे पास आ गया |
जब तक न मिला दर्द मेरा हों न सका वो ,
आँसू मिले तो वो हमारे साथ आ गया |
तनहाइयों ने उसको यूँ गुमराह कर दिया ,
बस प्यार कि नज़र से ही वो मात खा गया |
सोचा नहीं था छोड़ के वो जायेगा कभी ,
था डूबते में जिसका मुझे हाँथ आ गया |
मैं रोया बहुत पर वो नहीं लौट के आया ,
वो वक्त था मैं जिससे यार मात खा गया |
क्यूँ लग रहा है हमको छिपा कुछ रहे हों तुम ,
आँखों से अश्क पोछ के क्यूँ आ रहे हों तुम |

ये मज़हबी दुनिया है सियासत से जो है चलती ,
इसको वफ़ा का पाठ पढ़ा क्यूँ रहे हों तुम |

मजबूरियों को जिसने मुकद्दर समझ लिया ,
जीने कि राह उसको सिखा क्यूँ रहे हों तुम |

जिसको तुम्हारे प्यार कि है कद्र तक नहीं ,
उसको  भला ये प्यार जता क्यूँ रहे हों तुम |




मैंने कल मिटते देखा है ,
दूर खड़े उस एक मनुज को ,
मृत्युंजय का चोगा पहने ,
जीवन  से लड़ते देखा है |
जयी समझ कर खुद को उसने
मृगतृष्णा में देखो पड़के,
अपना जीवन नष्ट किया है ,
खुद को कुछ पथ भ्रष्ट किया है
मैंने कल उस भीष्म सरीखे
मानव को फिर से अपनी ही
एक अटल आग्नेय प्रतिज्ञा
से पीछे हटते देखा है
मैंने कल मिटते देखा है ...........
ह्रदय एक वैराग्य बसाये ,
तन पर धूनी भस्म रमाये ,
मन मस्तिष्क कुंवारा करके ,
आत्मा को बिन ब्याहा रख के ,
मैंने कल एक सन्यासी को ,
जोगिया रंग कि चादर डाले ,
नित्य लगन अनिमेष नयन से ,
किसी  एक अनजान नज़र की ,
राहों को तकते देखा है ,
मैंने कल मिटते देखा है |
बताऊँ किस तरह तुमको कि किस किस ने सताया है ,
दुखाया है हमारा दिल , हमें तोड़ा जलाया है ,
तुम्हें है आज हमसे प्यार क्यूंकि दूर से देखा ,
जिन्होंने पास से देखा वो रुक एक पल न पाया है |
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