Thursday, 14 June 2012

तुम्हारी सती

आज  पहली बार
सड़क पर चलते
खुद को अकेला पाया था मैंने |
वो सडकें जिसके ,
मील के पत्थर कभी साथ गिने थे हमने |
पहली बार उस मंदिर के भगवान
अपने नहीं लगे ,
जहाँ तुम्हारी अर्धांगिनी बन ,
तुम्हारी  वामांगी बन ,
तुम्हारे सारे दुःख
अपनी झोली में,
मांगे  थे मैंने |
आज पहली बार माँ गंगा पर
क्रोध उड़ेल आयी थी मैं ,
शिव और सती के प्रेम कि साछी थी वो ,
तो हमारा प्रेम क्यूँ नहीं दिखा उन्हें ,
जो बस आपके लिए था ,
उनके तट पर ही तो ,
अपना सर्वस्व दे दिया था आपको |
कोई भेद नहीं बचा था ,
हमारे बीच |
क्या  तुम्हे याद नहीं आते हैं वो पल
जिसने तुम्हारी सती को
तुम्हारे इतना नज़दीक ला दिया ,
कि आज
तुम्हारे बिन वो
असमर्थ है जीने में भी |

जो मेरे साथ चलना चाहता था वो नहीं है अब ,
बहुत नाराज़ है मुझसे, वो  कहता कुछ नहीं है अब ,

Wednesday, 13 June 2012

विरह कि अग्नि में जलती नदी सी बह रही हूँ मैं ,
मैं निश्छल हूँ मगर छल ज़िंदगी का सह रही हूँ मैं ,
कभी कुछ न कहा हमने तो लोगों ये यही समझा ,
कि विह्वल प्रेम कि प्यासी हूँ तुझमे रह रही हूँ मैं |

मैं स्वार्थी हूँ

क्यूँ इतने दिनों के साथ के बाद 
भी समझ नहीं पाए तुम 
ह्रदय हमारा|
उन्हें  भी कष्ट 
नहीं दे सका मेरा ह्रदय ,
जो मुझे ही ठग कर 
जीवन के रणछेत्र में अकेला छोड़ गए ,
आज वो भी हैं तुम्हारे मित्रों कि सूची में ,
जो आस्तीन में सांप बन कर 
तुम्हे ही ठग रहे थे |
पर कभी भरोसा नहीं किया तुमने 
मुझ पर ,
न जाने कौन सा स्वार्थ सिद्ध किया था ,
मैंने तुमसे ,
क्या कभी किसी सांसारिक वस्तु की  
अभिलाषा कि थी मैंने |
किसी ने तुमसे कोई वाद्ययंत्र माँगा ,
किसी ने लैपटॉप ,
किसी ने कपड़े मांगे ,
किसी ने कोई इलेक्ट्रोनिक गजेट |
पर मैंने तो बस समय माँगा था ,
साथ माँगा था तुम्हारा ,
दुःख मांगे थे तुम्हारे ,
और यही चाहा था कि तुम्हारे रस्ते के सारे शूल 
मेरे पैरों में चुभ जाये ,
गर ये स्वार्थ था 
तो मैं स्वार्थी हूँ |
मुझे पहचान न पाया मुझे अपना बताता था ,
वो मुझसे दूर होकर के मुझे कितना सताता था ,
मैं उसको याद करके हर घड़ी रोती सिसकती थी ,
वो मुझको देख कर रोता सदा ही मुस्कुराता था |
उसे लगता था जब चाहेगा मुझको आज़मा लेगा ,
मुझे थामेगा  मन से और मन से ही भुला देगा ,
मगर उसको खबर थी ये नहीं कि हम भी शातिर है ,
उसी के वास्ते मिट कर उसी को

मत दो इतनी तकलीफ हमें,
एक दिन खुद रोना आ जाये ,
एक दिन तू ढूँढें दुनिया में ,
पर मेरी छब तक न पाए |
ये दुनिया है इस दुनिया में हैं सब स्वारथ के मीत प्रिये ,
सब आश्वासन देने को हैं , कोई न देता साथ प्रिये ,
बस हम तुम हैं एक दूजे के , जीना मरना एक साथ प्रिये ,
इतना जिस दिन तू समझेगा आ जायेगा तू पास प्रिये ,
थोड़ा तो कर विश्वास अगर ,
वो बीते पल कुछ याद आये ,
हम इंतज़ार में बैठे हैं ,
न जाने तू कब आ जाये |
                                     मत दो इतनी तकलीफ हमें,
                                     एक दिन खुद रोना आ जाये |
तुझ  संग ही प्रीत लगाई है , तुझ संग ही बाँधा है बंधन ,
संग जीने कि खाई कसमें , तुझ बिन जीवन में है क्रंदन ,
तुम अनुभव से चलते हों बस , मेरा जीवन तेरा वंदन ,
जब तक तुम हों तब तक ही है मेरे जीवन में स्पंदन ,
एक दिन मेरी ये प्रीत देख ,
आँखों में आँसू आ जाये ,
हम इंतज़ार में बैठे हैं ,
न जाने तू कब आ जाये |
                                     मत दो इतनी तकलीफ हमें,
                                     एक दिन खुद रोना आ जाये |
                                    
आ  जाओ वापस प्रिय वरना ये जीवन सफल नहीं होगा ,
तुझ बिन मरना आसान नहीं तो जीना फिर कैसा होगा ,
सिन्दूर  पुकारे है तुझको, बिंदिया भी टेर लगाये है ,
बस आ जाओ वापस तुम बिन जग  मुझको बहुत सताए है ,
जो बंधन बांधा था प्रिय ने  ,
शायद उस खातिर आ जाये ,
हम इंतज़ार में बैठे हैं ,
न जाने तू कब आ जाये |
                                     मत दो इतनी तकलीफ हमें,
                                     एक दिन खुद रोना आ जाये |




Tuesday, 12 June 2012

जिन लोगों ने मुझको मारा ,रख कर बीच बाजार में ,
कर पाए हम बुरा न उनका , हम तो  थे मंझधार में |
प्यार भरा था दिल में इतना, नफरत कि थी जगह नहीं ,
फिर कैसे दुत्कारें उसको जो था दिल और जान में|
दुनिया  का दस्तूर यही है अपना करके ठुकराना ,
इसलिए ये आँखें नम थी