Monday, 13 August 2012

तुम्हे आना हो आ जाओ

सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ ,
अकेले लड़ रहे हैं जिंदगी से ये समझ जाओ |
               सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ |
बहुत नादानियाँ की है बहुत तुमको सताया है ,
अगर जो मानते हो हमको अपना माफ कर जाओ |
               सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ |
तुम्हारे थे बहुत कुछ हम , हमारे थे बहुत कुछ तुम ,
अगर ये याद हो तुमको तो वापस लौट कर आओ |
               सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ |
समझ आती नहीं हमको हमारे दिल की मजबूरी ,
अगर बिन बोले तुम समझो तो हमको भी ये समझाओ |
               सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ |
ये दुनिया है बड़ी संगदिल बड़ी झूठी बड़ी मक्कार ,
हमें दुनिया के अच्छे रुख को तुम न बतलाओ |
                सफर पर चल पड़े हैं हम तुम्हे आना हो आ जाओ |

Saturday, 11 August 2012

परिचय हुआ है |

आज फिर मेरे निकेतन से मेरा परिचय हुआ है |
मैं भटक कर आयी दुनिया देख ली सारी दिशाएं ,
पर  सकल जग में मिली बस वेदनाएं वेदनाएं ,
टूट कर बिखरी बहुत जब दर्द ने चीत्कार मारी ,
कोई न था साथ मेरे थी तनिक संवेदनाएं |
फिर अकेली बेसहारा ढूँढती कोई किनारा 
प्रश्न खुद से कर रही थी तब मिला मुझको सहारा ,
आज फिर मेरा प्रिये से प्रेमवश परिणय हुआ है ,
                   आज फिर मेरे निकेतन से मेरा परिचय हुआ है |
जब किया विश्वास दुनिया पर मिला बस झूठ मुझको ,
प्रेम से परिणय किया तो फिर मिला रणछेत्र मुझको ,
काम , माया , क्रोध के मुझको मिले लाखों पुजारी ,
पर मिला न संत कोई देख ली दुनिया तिहारी ,
आज फिर एक बार सुन शिव ,सत्य का दर्शन हुआ है ,
                   आज फिर मेरे निकेतन से मेरा परिचय हुआ है |
स्वांस  टूटी आस टूटी , हर मनोरथ चाह रूठी ,
प्रेम की हर डोर टूटी ,तिमिर में हर रात डूबी ,
अश्रु फूटे , अधर रूठे , मौन से संगम हुआ था ,
जब लगा था तुम नहीं प्रिय खुद पे ही कुछ भ्रम हुआ था ,
आज तुम जब साथ फिर से ईश का वंदन हुआ है ,
                   आज फिर मेरे निकेतन से मेरा परिचय हुआ है |

सत्य से परिचय हुआ है

आज दिल हल्का हुआ है ,
मान कर सबी गलतियां ,
फिर  सत्य से परिचय हुआ है |

कल तलक हम चल रहे थे ,
भिन्न  पर विश्वास करके,
और  खुद को छल रहे थे ,
अनृत का सम्मान करके,
मधु  सरीखी जिंदागी में ,
गरळ का संचन हुआ है |
                     सत्य से परिचय हुआ है |
दंभ उसको है बहुत , 
वो बन गगनचर उड़ रहा है |
छोड़ कर सारे अनुग्रह ,
राह अपनी चल रहा है ,
इसलिए वह स्वयं ,
अपने आप का दुश्मन हुआ है |
                    सत्य से परिचय हुआ है |
                   



Tuesday, 7 August 2012



न होता

चंद बातें




Friday, 3 August 2012

चार चार पंक्तियाँ

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