लोग अपना बन के हमको यूँ दगा देने लगे ,
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
बंद दरवाज़े दिलो के कर के जब बैठे सभी ,
हमने दिल की सांकलों के सारे ताले तज दिए |
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
वो तो अपनों का भी अपना हों नहीं पाया मगर ,
गैर के गम में हमारे दिल ने आँसू खो दिए |
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
कल तलक जो कहता था कि ज़िंदगी उसकी हैं हम ,
आज गैरों के शहर में वो ही खुद को खो दिए |
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
वक्त रहते जो परिंदे लौट कर आयी नहीं ,
नीड़ अपने उन परिंदों ने सदा को खो दिए |
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
फिर खुदा भी उनकी हसरत के महल का क्या करे ,
नीव के पत्थर ही कमज़ोर जिसने बो दिए |
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |