Friday, 27 July 2012

साथ

सांसें कब थी साथ हमारे
बस तब तक प्रिय
जब तक तुम थे साथ हमारे ,
अब तो बस  पिंजर है मेरा
आत्मा तो आज़ाद हुयी है ,
हाँ रहने को साथ तुम्हारे |

प्रश्न कैसे ?

विहंगम दर्द कि गंगा न जाने आयी है कैसे ?
सुनामी सी हमारे दिल पे जाने छाई है कैसे ?
सभी को अपना समझा था पराया था नहीं कोई ,
तो तुझमे दुश्मनी की ये झलक फिर आयी है कैसे ?
समंदर  दर्द का अंदर भरा है कैसे कुछ बोलें ,
कि अपनो में भी गैरों सी हरकत आयी है कैसे ?
सभी कुछ पाने कि चाहत में खो कर सब वो बैठा है ,
ना जाने उसमे चाहत कि ललक ये आयी है कैसे ?
कि दो नावों पे रखो पैर मत मिल पायेगा ना कुछ ,
कहावत ये पुरानी उसको अब समझाएं हम कैसे ?
बहुत ऊंचाइयों पर भी नहीं जिया जाता नहीं है दोस्त ,
उसे सीमाओं का मतलब भला बतलाएं अब कैसे ?

उनको ही पूजा किये

लोग  अपना बन के हमको यूँ  दगा देने लगे  , 
और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
बंद दरवाज़े दिलो के कर के जब बैठे सभी ,
हमने दिल की सांकलों के सारे ताले तज दिए |
                      और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
वो तो अपनों का भी अपना हों नहीं पाया मगर ,
गैर के गम में हमारे दिल ने आँसू खो दिए |
                      और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
 कल तलक जो कहता था कि ज़िंदगी उसकी हैं हम ,
आज गैरों के शहर में वो ही खुद को खो दिए |
                      और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
 वक्त रहते जो परिंदे लौट कर आयी नहीं ,
नीड़ अपने उन परिंदों ने सदा को खो दिए |
                      और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |
फिर खुदा भी उनकी हसरत के महल का क्या करे ,
नीव के पत्थर ही कमज़ोर जिसने बो दिए |
                      और हम पत्थर मिले जो उनको ही पूजा किये |

मौन सा है छा गया

क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया ,
वो बहुत रूठा है हमसे , गैर उसको भा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
हमने तो अपने खुदा पर छोड़ दी कश्ती कभी ,
अपने हिस्से के गुनाहों कि सज़ा वो पा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
वक्त रहते जो समझ लेगा स्वयं की गलतियां ,
बस वही मंझधार में फिर से किनारा पा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
मैंने जिसको हद से ज्यादा प्यार से देखा कभी ,
मैं उसी में अपने शिव का बिम्ब देखो पा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
उसने धोखों पर दिए हर बार हैं धोखे हमें ,
इसलिए वो आज हर रिश्ते से धोखा खा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
लौट कर आता है अपना ही किया खुद सामने ,
मेरी आँखों कि नमी से इसलिए घबरा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|
पूछती रह जायेंगी सदियाँ ये सदियों तक उसे ,
किन गुनाहों की सज़ा वो उम्र भर तक पा गया |
                           क्या लिखूं अब ज़िंदगी में मौन सा है छा गया|

Sunday, 22 July 2012

गंगा

मैं गंगा हूँ मुझे अपनी शरण में नाथ तुम ले लो ,
जटाओं में संभालो तुम हमें तुम साथ में ले लो ,
मुझे वरदान दो मैं त्रास दुनिया के हरूँ सारे ,
मुझे  अपना बना कर तुम गरल सहने का गुण दे दो |





दोस्ती और प्यार

किसी ने अब तलक मेरे लिए कविता नहीं लिखी ,
जो लिखी है सनम तुमने तो अब बोलो कि क्यूँ लिखी ,
किया क्या जुर्म है हमने जो तुमने दोस्त ऐ मेरे
कफ़न पर दोस्ती के प्यार कि ये इल्तिजा लिखी |

Wednesday, 4 July 2012

अटक लग जाती है हर काम पर मेरे ना जाने क्यूँ ?
बड़ी शिद्दत से करता हूँ मगर मैं काम हर अपना |