Wednesday, 4 July 2012

तीर्थ धाम

हर नया नाम मुझे तेरे नाम जैसा लगा ,
और कलयुग में मुझे तू ही राम जैसा लगा |

रास जो खेलें मुझे ऐसे बहुत लोग मिले ,
पर मुझे एक तू ही मेरे श्याम जैसा लगा |
घूम आये है जहाँ के सभी गांवों और शहर ,
पर मुझे तेरा ह्रदय तीर्थ धाम जैसा लगा |

Tuesday, 3 July 2012

हाँथ ज़माने वाले

अख्ज़ बन कर ना मिल ऐ रिश्ते बनाने वाले ,
अज़ल तक रहते परेशान है ये करने वाले |
ये अजब बात है  आइना भी उनका ना हुआ ,
जो रहे रोज रूप अपना बदलने वाले |
ये तो आगाज़ है अंजामे सफर क्या होगा ,
बस यही सोचते है राह पे चलने वाले |
वो तो आशुफ्ता मेरे पास आके बैठ गया ,
बस इसी आस में कि हम हैं बचाने वाले |
कौन  कहता है आसमानी फ़रिश्ते हैं वो ,
वो तो हमको हैं सरेआम सताने वाले |
कैसे बतलाएं किया हमपे सितम किस तरह ,
जो इबादत में उठे हाँथ ज़माने वाले |


अख्ज़= पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी
अज़ल= अनन्तकाल, सनातनत्व, नित्यता
आशुफ़्ता= बौख़लाया हुआ, घबराया हुआ, भ्रमित

जानते हैं ये |

इन्हें समझाइये अपने तो बोलेंगे ही बोलेंगे ,
मगर ये इनपे है कि किसको अपना मानते हैं ये |
अगर बेबात ही इल्ज़ाम लगाते रहेंगे दोस्त  ,
तो हम भी टूट जायेंगे ये भी जानते हैं ये |
अकेले में भी रोयेंगे इन्ही के सीने से लगकर ,
मगर मेरा कहा सब झूठ अब तो जानते हैं ये |
फरेबी कहते हैं हमको  ज़रा कुछ सोच कर बोलें ,
कि उनकी राह में कांटे नहीं अब मानते हैं ये |
हमारे हाँथ के ज़ख्मो से टपका है लहू दिल का ,
कि हर कतरे पे उनका नाम है ये जानते हैं ये |
सोचती हूँ कुछ लिखूं
पर
पहले कागज का इनकार  ,
फिर  कलम का इनकार ,
और अंततः  ह्रदय का इनकार ,
ह्रदय  ने कहा
नहीं लिखना कुछ भी
क्यूँकि तुम लिखोगी
तो हर
मेरे भाव फिर कागज पर उतारोगी ,
और उन्हें कमज़ोर कर दोगी ,
पर वो नहीं जानता
कि अब कभी ह्रदय अपने भाव कहेंगे ही
बड़े साइंसदानो ने कहा कि ढूंढ डाला है ,
खुदा का एक कतरा मिल गया है आके पहचानो

Monday, 2 July 2012

जाने क्यूँ एक एक पल मुझको
बरसों जैसा अब लगता है ,
सीधा सदा सच्चा भी अब ,
दुनिया जैसा क्यूँ लगता है |
रूप का दर्प पहले निहारा करो ,
फिर मुझे प्रियतमा तुम पुकारा करो ,
दाल रोटी कि मुझको ज़रूरत नहीं ,
बस मुझे प्यार से तुम सराहा करो|