Thursday, 14 June 2012

उस तरह कि बन गयी हूँ मैं

तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं ,
कि खुद में मस्त रहती हूँ बहुत अब तन गयी हूँ मैं|
                            
                                  तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं|

मैं पहले तेरी खातिर टूट कर हर दम बिखरती थी ,
कि अब पत्थर सरीखी ठोस देखो बन गयी हूँ मैं |

                                  तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं|

मुझे इतना रुलाया है तेरी यादों ने ऐ साहिब ,
कि अपने आंसुओं कि बाढ़ में ही सन गयी हूँ मैं |

                                  तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं|

 मै  लैला हीर शीरी कि तरह का जज्बा रखती थी ,
तेरी ख्वाहिश पे दुनिया कि तरह कि बन गयी हूँ मैं

                                  तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं|

पहले  बस तेरी ही खातिर था जीना और मरना भी ,
मगर अब दोस्त दुनिया भर कि देखो बन गयी हूँ मैं |

                                  तू जैसा चाहता था उस तरह कि बन गयी हूँ मैं|



सनम कहना पड़ेगा अब

कठिन राहों में हमको साथ चलना भी पड़ेगा अब ,
कि कितने इम्तिहानों से गुजरना भी पड़ेगा अब|

अगर हों दिल में हसरत ज़िंदगी भर साथ की  तुझको ,
तो ये तू जान ले दुनिया से लड़ना भी पड़ेगा अब |

मोहब्बत बंदगी सी है मोहब्बत कि गुजारिश में ,
शमा बन कर के आंधी से झगड़ना भी पड़ेगा अब |

नहीं दो पल का हमको साथ अब तेरा गंवारा है ,
मेरी परछाईं बन ता उम्र चलना भी पड़ेगा अब |

सियासत  की कहानी प्यार में लागू नहीं होती ,
कि दिल पर मेरे तुझको राज भी करना पड़ेगा अब |

ये वादा कर न मुझको छोड़  के जायेगा तू तन्हा ,
कसम खा कर के ये तुझको सनम कहना पड़ेगा अब |



जीवन

कौन है किसके साथ में किसका किससे मेल ,
जीवन रेलमपेल है चार पलों का खेल ,
चार पलों का खेल कि इसमे कोई न जीते ,
चाहे दिखे कोई भी  कैसा पर अंदर से सब हैं रीते|

जीने कि कोई वजह अब तो नहीं दिखती

सुबह जब तक तेरी आवाज़ कानों में नहीं पड़ती ,
मुझे ये ज़िंदगी हमदम नहीं है ज़िंदगी लगती |
तू मुझको माफ कर दे मैं तेरी परछाई हूँ मालिक ,
कि तेरे बिन मेरी हस्ती मुझे हस्ती नहीं लगती |
बहुत चाहा है तुझको और पूजा है तुझे मैंने ,
कि  तुझ बिन मंदिरों कि मूर्तियां ईश्वर नहीं लगती |
तू धडकन में तू सांसों में तू पलकों में तू आँखों में ,
कि मुझको मुझमे तू दिखता है , खुद में मैं नहीं दिखती|
जो देखूं आइना तो रो ही पड़ती हैं मेरी आँखें ,
कि अपने जीने कि कोई वजह अब तो नहीं दिखती|

वो मेरी अंखियों में ही रहते हैं

लब पर नाम नहीं भी आये तो भी सब पढ़ लेते हैं ,
लोग ये कहते हैं वो मेरी अंखियों में ही रहते हैं |

कैसे छुपाएँ राजे उल्फत कैसे उन्हें बतलाएं ना ,
मेरी हंसी में वो दिखते हैं और आँसू में बहते हैं |
                                लोग ये कहते हैं वो मेरी अंखियों में ही रहते हैं |
भूल गए हैं मुझको मेरे अपने से बेगाना कर ,
अब  तो हम उनके सीने मे धडकन बन कर रहते हैं |
                                लोग ये कहते हैं वो मेरी अंखियों में ही रहते हैं |
दर्द  का क्या है एक न एक दिन खत्म इसे हों जाना है ,
दोस्त है दो पल का ये मेरे प्यार से इसको सहते हैं |
                                लोग ये कहते हैं वो मेरी अंखियों में ही रहते हैं |

मुझे माफ कर दो

मुझे माफ कर दो प्रिय मुझसे 
अनजाने में भूल हों गयी,
तेरी बातें मान  सकी ना ,
गलती ये अब शूल हों गयी |
जब तक तुम थे साथ 
सदा ये लगा कहाँ जाओगे तज कर , 
सदा  ठिठोली कि थी मैंने ,
हंस कर, रो कर , गा कर , सज कर |
पर इस पल भर कि दूरी ने ,
मुझको ये एहसास कराया ,
तुम बिन कुछ मैं नहीं 
कि जैसे नहीं प्राण बिन कोई काया |
बिन तेरे ऐ प्रियतम मेरे ,
जीवन नगरी धूल हों गयी ,
                                          मुझे माफ कर दो प्रिय मुझसे ,
                                          अनजाने में भूल हों गयी |
मैं तो तेरी ही पगली हूँ ,
तेरी खट्टी तेरी मीठी ,
तुझसे अलग नहीं मैं कुछ भी ,
मैं  बस तेरी सखी सहेली ,
तू ही हर रिश्ते में मेरे ,
तू धडकन तू सांसों में ,
बिन तेरे स्पर्श हमारी ,
काया भी बेनूर हों गयी ,
                                          मुझे माफ कर दो प्रिय मुझसे ,
                                          अनजाने में भूल हों गयी |


बहना किस्मत हई मगर दूर निकलने को नहीं
हम तेरा साथ निभाने के लिए बहते हैं |