Monday, 4 June 2012
जीवन के उस पार
फिर वही दुखांत
क्या कभी सुख कि परिणति होगी
क्या कभी मेरे जीवन के इस कीचड़ में भी
कमल जन्म लेगा ;
क्या कभी कोई राम
मुझे भी अहिल्या कि तरह उद्धारेगा ,
बस इसी सोच में चला जा रहा था जीवन ,
हर ने आ कर भावनाओं के पत्थर फ़ेंक
मन में हलचल मचा दी ,
परन्तु ह्रदय सत्य कि समाधी पर था ,
भेद कर लिया उसने
क्या सुख देंगी तुझे यह छडिक जीवन में बंधी
जीवन से लड़ती
अपने सुख के लिए मरती कयाये |
तुझे तो सुख शिव कि शरण में लिखा है ,
जपते हुए
"सत्यम शिवम सुन्दरम"
और
"ओम् नमः शिवाय "
का जाप
तुझे जाना होगा अब इसी छण
जीवन के उस पार |
नहीं मालूम कि तुम सत्य थे
नहीं मालूम कि तुम सत्य थे
या
फिर किसी असत्य ने दस्तक दी थी
मन पर मेरे ,
तुम्हारी आँखों को पढने कि चाह में ,
बार बार आती रही पास तुम्हारे ,
पर कभी मिला ही नहीं सकी नज़रें तुमसे
कभी शर्म के वशीभूत हों ,
कभी प्रेम के ,
और
कभी भय के कि कहीं पढ़ न लूं मैं
तुम्हारी आँखों में वो जो तुम्हारे कर्म कहते हैं |
तुम प्यार के दावे करते रहे और मैं उन्ही को सत्य मान
जीती रही ,
खुश होती रही ,
और
एक दिन तुम्हारी डायरी के पन्नों पर
तुम्हारी ही लेखनी से
कई बार लिखा देखा किसी और का नाम |
फिर भी मन को संजोया
और अपने विश्वास को भी ,
इस जोड़ तोड़ में कि पूछूं या नहीं
मैं जाने कब कह गयी तुमसे ह्रदय कि बात ,
पर स्पस्टीकरण न देकर
तुमने मुझे ही आरोप प्रत्यारोप के
भंवर में फंसा दिया ,
मुझे ही गलत कह
मेरे प्रेम का अनादर कर चले गए तुम
शायद न वापस आने के लिए,
इतने प्रयत्न किये थे तुमने ,
मुझे छोड़ कर जाने के लिए |
इतने प्रयत्न किये थे तुमने ,
मुझे छोड़ कर जाने के लिए |
मेरा इंतज़ार |
कितना द्वन्द है मन में
कि कहूँ या न कहूँ ,
वो पुरानी बातें जिन्होंने मुझे
खत्म कर दिया जीते जी ,
सांस तो लेती हूँ
ह्रदय में स्पंदन भी महसूस करती हूँ ,
फिर भी प्राण नहीं ,
हर पल बस तुम्हारा स्पर्श याद आता है ,
जिसने जीवन को एक नया आयाम दिया था
मैं खुद से कब तुम्हारी मीठी , पगली ,
और न जाने क्या क्या बन गयी थी ,
मेरे लिए अपना घर छोड़
तुम मेरे समीप हमारे नीड़ का
निर्माण कर रहे थे ,
जहाँ हमने वो पल गुज़ारा
जिसने हम दोनों का अंतर खत्म कर दिया ,
दो से एक होने के इस सफर में ,
मैं बस तुम्हारी तुम्हारी होती गयी ,
और तुम हर बार मुझसे दूर और दूर ,
मुझे तुम्हारी कमियां भी अच्छी लगाने लगी ,
और तुम्हे मेरे अंदर कि सारी अच्छाइयां ,
जिनका आभास तुमने मुझे कराया था ,
झूठी लगाने लगी |
अभी भी मन के अंदर
विश्वास लिए बैठी हूँ
तुम लौट कर आओगे ,
एक रोज ,
फिर मुझसे कहोगे
कि मैं ही प्राण हूँ तुम्हारा ,
जीवन का आधार हूँ तुम्हारा ,
पता है कि बहुत छोटा होगा ये इंतज़ार ,
दुनिया में प्यार नहीं
वही है जो तुमने मेरी झोली में डाला है ,
बस फर्क इतना है आज ये मेरे हिस्से में है ,
कल तेरे हिस्से में होगा ,
इंतज़ार
मेरा इंतज़ार |
तुम कहना भी चाहते थे
तुम्हारे साथ
थी जब मैं आज
क्यूँ धूप में तपती हवा भी ,
हों गयी थी शीतल बयार |
क्यूँ भूख का एहसास जागा था ,
क्यूँ पानी में भी लगी थी
गंगाजल जैसी मिठास ,
क्यूँ लगा था कि तेरे
सीने से लगकर रो लूं ,
और अपने किये सारे पाप धो लूं |
क्यूँ ईश्वर दिखा था मुझे तुमने ,
जब तुम्हारे पास होने के एहसास से
मैं खुश भी थी और सहमी भी ,
क्यूँ लग रहा था कि
कहीं खो न दूं ,
वो सुख जो जीवन में पहली बार मिला है ,
प्रेम पाने का सुख ,
बांटा तो बहुत था प्रेम ,
बहुत लोग थे जो थे मेरे लिए अपने ,
पर क्या मैं किसी का अपनी थी ,
अभी तक तो किसी ने इतना स्नेह
नहीं दिखाया था ,
किसी ने नहीं कहा था
कि मैं उसका जीवन हूँ ,
क्यूँ तुम्हारी ख़ामोशी में ढूँढा था मैंने
वो सब कुछ जो मैं सुनना चाहती
और शायद तुम कहना भी चाहते थे |
Sunday, 3 June 2012
ना वादों पर भरोसा है ना बातों पर यकीं तेरी,
कभी पूरी न कि तूने मुरादें एक भी मेरी |
अगर तूने मुझे उस तरह अपनाया नहीं होता ,
तो तुझसे इस कदर जुडती नहीं नजदीकियां मेरी |
मैं तेरे सामने हंस कर बता देती हूँ मैं खुश हूँ ,
मगर दिलकी नमी को जानती तन्हाइयां मेरी |
मैं तुझसे जुड गयी हूँ इस कदर ऐ हमसफ़र मेरे ,
कि मुझको दिख नहीं पाती हैं अब रुसवाइयाँ मेरी |
अगर तू साथ देने का करे वादा तो फिर हम भी ,
चलेंगे साथ तेरे उम्र भर परछाई बन तेरी |
Subscribe to:
Posts (Atom)